महंगाई का बड़ा झटका! सितंबर में खुदरा महंगाई 5.6% तक पहुंचने का अनुमान, सब्जियों से लेकर दाल-तेल तक महंगे होने की आशंका

नई दिल्ली: देश में महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका है। खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों, ऊर्जा लागत में तेजी और प्रतिकूल आधार प्रभाव के कारण सितंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.6% तक पहुंच सकती है। ऐसा होने पर यह करीब 23 महीनों का उच्चतम स्तर हो सकता है। अगस्त में खुदरा महंगाई दर 4.82% दर्ज की गई थी।‘मिंट’ की ओर से 19 अर्थशास्त्रियों के बीच कराए गए सर्वेक्षण में सितंबर की खुदरा महंगाई दर 5% से 5.9% के बीच रहने का अनुमान जताया गया है। सितंबर के आधिकारिक आंकड़े 12 अक्टूबर को जारी किए जाने थे। इसलिए 5.6% का आंकड़ा अनुमान है, न कि सरकार की ओर से जारी अंतिम आंकड़ा।

महंगाई बढ़ने का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। सब्जियां, दालें, अनाज, खाद्य तेल और प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ महंगे होने पर परिवारों का मासिक बजट बिगड़ सकता है। वहीं, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से परिवहन और अन्य वस्तुओं की लागत भी बढ़ने की आशंका है।

अप्रैल से लगातार बढ़ रही खुदरा महंगाई

रिपोर्ट के अनुसार, देश में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित खुदरा महंगाई दर अप्रैल से लगातार बढ़ रही है।

  • अप्रैल: 3.48%
  • मई: 3.93%
  • जून: 4.38%
  • जुलाई: 4.45%
  • अगस्त: 4.82%
  • सितंबर: 5.6% रहने का अनुमान

यदि सितंबर का अनुमान सही साबित होता है, तो खुदरा महंगाई लगातार छठे महीने बढ़ेगी। इससे घरेलू खर्च और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने की आशंका है।

सब्जियों, दालों और खाद्य तेल की कीमतों से बढ़ रहा दबाव

खुदरा महंगाई में बढ़ोतरी की एक प्रमुख वजह खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में खाद्य वस्तुओं का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के कारण इनके दाम में बदलाव का असर सीधे महंगाई दर पर पड़ता है।प्याज और अन्य सब्जियों के अलावा अनाज, दालों, खाद्य तेल और चीनी की कीमतों में बने दबाव से महंगाई का दायरा बढ़ रहा है। इसका मतलब है कि महंगाई की समस्या केवल कुछ सब्जियों तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजमर्रा की कई जरूरी वस्तुओं की कीमतें भी इसमें योगदान दे रही हैं।इसका सबसे अधिक असर उन परिवारों पर पड़ सकता है, जिनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन और घरेलू जरूरतों पर खर्च होता है।

महंगे कच्चे तेल से बढ़ सकती है परेशानी

आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा मौसम और अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। कमजोर मानसून, अल नीनो की आशंका और ऊर्जा सहित अन्य जिंसों की ऊंची कीमतें आपूर्ति पर दबाव बढ़ा सकती हैं।पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी भारत के लिए चिंता का विषय है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने पर परिवहन और उत्पादन की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

हालांकि, सितंबर में महंगाई दर बढ़ने की संभावित वजह केवल मौजूदा कीमतों में वृद्धि नहीं है। पिछले साल सितंबर में खाद्य मूल्य सूचकांक में गिरावट दर्ज की गई थी। ऐसे में आधार प्रभाव में बदलाव भी सालाना महंगाई दर को ऊपर दिखा सकता है।

रेपो रेट बढ़ने से EMI पर पड़ सकता है असर

महंगाई के दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अक्टूबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो दर 0.25 प्रतिशत अंक बढ़ाकर 5.50% कर दी थी। साथ ही, केंद्रीय बैंक ने अपनी नीतिगत दिशा में बदलाव करते हुए रुख को ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ कर दिया।ब्याज दरों में इस बदलाव से निकट भविष्य में दरों में कटौती की संभावना प्रभावित हो सकती है। यदि बैंक बढ़ी हुई ब्याज दरों का बोझ ग्राहकों तक पहुंचाते हैं, तो होम लोन, कार लोन और अन्य कर्ज लेने वालों की मासिक किस्त यानी EMI बढ़ सकती है।विशेष रूप से उन लोगों पर दबाव बढ़ सकता है, जिनके ऋण की ब्याज दरें रेपो रेट में बदलाव के अनुसार संशोधित होती हैं।

आम आदमी के बजट पर बढ़ सकता है दबाव

खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी और ऊर्जा लागत में संभावित वृद्धि से आने वाले महीनों में घरेलू बजट प्रभावित हो सकता है। महंगाई की वास्तविक दिशा खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता, मौसम, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और रुपये की विनिमय दर पर निर्भर करेगी।यदि महंगाई में बढ़ोतरी जारी रहती है, तो आम परिवारों को अपनी मासिक आय का बड़ा हिस्सा जरूरी वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च करना पड़ सकता है।

फिलहाल सितंबर की 5.6% खुदरा महंगाई दर एक अनुमान है। आधिकारिक आंकड़ों और आगे के आर्थिक संकेतकों से ही स्पष्ट होगा कि देश में महंगाई का दबाव कितना बढ़ा है।

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