महाराष्ट्र में लोकसभा सीटों का मेगा विस्तार संभव, 2029 से पहले बदल सकता है पूरा सियासी खेल

नागपुर- महाराष्ट्र में आगामी वर्षों में राजनीतिक भूगोल पूरी तरह बदलने वाला है। केंद्र सरकार द्वारा 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण को लागू करने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। यदि प्रस्तावित बदलाव धरातल पर उतरते हैं, तो महाराष्ट्र की लोकसभा सीटों की संख्या मौजूदा 48 से बढ़कर 72 हो सकती है। यह विस्तार न केवल राज्य की राजनीति को प्रभावित करेगा, बल्कि शक्ति संतुलन में भी बड़ा उलटफेर ला सकता है। सूत्रों के अनुसार, देशभर में लोकसभा की कुल सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने का विचार चल रहा है, ताकि जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।

महाराष्ट्र पर प्रभाव: 24 नई सीटों का होगा इजाफा

वर्तमान में उत्तर प्रदेश (80 सीट) के बाद महाराष्ट्र 48 सीटों के साथ देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है। परिसीमन के नए प्रस्ताव के तहत राज्य में सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी संभावित है। इसका अर्थ है कि सतारा, पुणे, ठाणे और मुंबई जैसे तेजी से बढ़ते शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में नए निर्वाचन क्षेत्रों का गठन होगा। इतिहास पर नजर डालें तो 1952 के पहले चुनाव में तत्कालीन बंबई राज्य में 45 सीटें थीं, जो 1976 के परिसीमन के बाद 1977 में बढ़कर 48 हुईं और पिछले 49 वर्षों से स्थिर हैं।

महिला आरक्षण और 816 सीटों का गणित

सरकार की योजना 2029 के चुनाव से पहले ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को प्रभावी बनाने की है। इसके तहत कुल प्रस्तावित 816 सीटों में से एक-तिहाई यानी लगभग 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। महाराष्ट्र की प्रस्तावित 72 सीटों में से भी 24 सीटें महिला उम्मीदवारों के लिए सुरक्षित की जा सकती हैं। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया का सीधा संबंध अगली जनगणना से है। अनुमान है कि जनगणना 1 मार्च 2027 तक पूरी होगी, जिसके बाद परिसीमन आयोग अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार करेगा।

जनगणना और परिसीमन की चुनौती

सीटों के विस्तार में सबसे बड़ी बाधा समय सीमा है। सामान्य प्रक्रिया के अनुसार, परिसीमन में करीब 3 साल का समय लगता है। विपक्ष का आरोप है कि जनगणना और परिसीमन को महिला आरक्षण से जोड़ने के कारण इसमें देरी हो रही है। चर्चा यह भी है कि देरी से बचने के लिए सरकार 2011 की जनगणना को आधार बना सकती है, लेकिन दक्षिण भारतीय राज्य इसका विरोध कर सकते हैं क्योंकि जनसंख्या नियंत्रण के कारण उनकी सीटें उत्तर भारत के मुकाबले कम बढ़ेंगी।

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