
इंडियन प्रीमियर लीग में फ्रेंचाइजी खरीदने तक का उनका सफर सिर्फ प्रेरणादायक नहीं, बल्कि परिवर्तनकारी है। 1.63 अरब डॉलर (करीब 15,286 करोड़ रुपये) में राजस्थान रॉयल्स के अधिग्रहण के बाद वह वैश्विक खेल निवेशकों की विशिष्ट श्रेणी में शामिल हो गए हैं।
इसलिए खास है यह डील
- राजस्थान रॉयल्स (Rajasthan Royals) IPL की शुरुआती टीमों में से एक
- पहले सीजन की विजेता टीम
- ऐतिहासिक विरासत और मजबूत ब्रांड वैल्यू
- टेक और स्पोर्ट्स के मेल का नया मॉडल
आर्थिक तंगी में बीता बचपन
सोमानी का बचपन एक मध्यमवर्गीय परिवार में बीता, जहां आर्थिक तंगी हकीकत थी। पिता नंदकिशोर सोमानी के असामयिक निधन के बाद महज 16 वर्ष की उम्र में उनके कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई थी। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा को अपना आधार बनाया।
वाशिम के मुलीबाई चरखा विद्यालय से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद शेगांव स्थित संत गजानन महाराज कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से कंप्यूटर इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। क्रिकेट के प्रति गहरा लगाव होने के बावजूद उनके घर में टीवी तक नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने सपनों को शिक्षा और कौशल विकास की दिशा में मोड़ा। यही निर्णय आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
कौन है काल सोमानी
कितनी हो सकती है नेटवर्थ
टर्निंग पॉइंट
- 2000 के दशक में अमेरिका का रुख
- सीडर रैपिड्स (आयोवा) से करिअर की शुरुआत
- नौकरी से उद्यमिता की ओर कदम
- एरिजोना में सफल व्यवसाय स्थापित
- उनके व्यावसायिक उपक्रम एडटेक, डेटा प्राइवेसी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गवर्नेंस और स्पोर्ट्स टेक्नोलॉजी जैसे आधुनिक क्षेत्रों में फैले हुए हैं, जिसने उन्हें नवाचार की दुनिया में अग्रणी बना दिया है।
- आज उनके उपक्रम में अमेरिका में 1,000 से अधिक और पुणे में 400 कर्मचारी कार्यरत हैं।
- हैदराबाद में विस्तार की योजनाएं भी जारी हैं, जो उनके बढ़ते प्रभाव और भविष्य की दिशा को दर्शाती हैं।
जड़ों से जुड़ाव
वैश्विक सफलता के बावजूद काल सोमानी अपनी जड़ों से गहराई से जुड़े हुए हैं। उन्होंने अकोला-नागपुर राजमार्ग पर तलेगांव शामजीपंत में क्रिकेट अकादमी स्थापित कर जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को निखारने का कार्य किया है। साथ ही वंचित छात्रों के लिए 1 करोड़ रुपये का योगदान देकर उन्हें बेहतर प्रशिक्षण और अवसर उपलब्ध कराए हैं।वर्तमान में वह अमेरिका में रहते हैं, जहां उनकी मां लीलादेवी भी उनके साथ रहती हैं।
उनके बेटे अर्जुन ने अंडर-14 गोल्फ में विश्व चैंपियन बनकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। परिवार आज भी विदर्भ क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। उनकी बहन डॉ. रश्मि बजाज अकोला में निवास करती हैं, जबकि वाशिम के जवाहर कॉलोनी में उनका पुश्तैनी घर आज भी मौजूद है।
कहानी का संदेश
- सफलता सिर्फ संसाधनों से नहीं, दृष्टि से तय होती है।
- छोटे शहर सीमाएं नहीं, संभावनाओं की शुरुआत होते हैं।
- शिक्षा, धैर्य और जोखिम से बनती है बड़ी पहचान।



