समा के चावल मुख्य रूप से व्रत के लिए उपयोग किए जाते हैं, ये दिखने में बहुत छोटे और गोल आकार के होते हैं. समा के चावल को वरई, कोदरी, समवत, सामक चावल के नाम से जाना जाता है. गुजराती में इसे सामो (સામો) और मोरियो (મોરિયો) कहते है. अंग्रेजी में इसे Barnyard millet कहते हैं. भगर और वरी (वरी चा तांदुळ) नाम से इसे महाराष्ट्र में जाना जाता है. हिन्दी में इसे मोरधन और समा के चावल कहा जाता है, वहीं बंगाल की ओर ये श्याम या श्यामा चावल के नाम से जाने जाते हैं.उपवास के समय खाया जाने वाला ‘भगर’ (जिसे वरी चावल, समा चावल या सांवा चावल भी कहा जाता है) एक प्रकार का अनाज है जो उपवास के दौरान खाने के लिए उपयुक्त माना जाता है।
भगर के प्रमुख गुण और पोषक तत्व
इसमें उच्च फाइबर होता है, जो पाचन को बेहतर बनाने में मदद करता है। यह शरीर को आवश्यक प्रोटीन प्रदान करता है। इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिससे यह रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद करता है। इसमें आयरन, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस जैसे महत्वपूर्ण खनिज पाए जाते हैं।
समा चावल का व्रत-उपवास में उपयोग
समा के चावल को आध्यात्मिक और आर्युवेदिक दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है. वेदों में भी इन चावल का उल्लेख प्राप्त होता है, जिस कारण इन्हें वेद चावल भी कहा गया है. इस कारण हिन्दू धर्म में इसके उपयोग को व्रत के दौरान ज्यादा महत्व दिया जाता है. ऐसा माना जाता है कि व्रत के समय अनाज नही खाया जाता है. इसके बदले समा के चावल खाए जा सकते हैं. यह पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं.
स्वास्थ्य के लिए उपयोगी
यह सफेद चावलों की तुलना में अधिक स्वास्थ्यवर्धक होते है. समा के चावल में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, विटामिन ए, सी और ई अच्छी मात्रा में पाया जाता है. इसके अतिरिक्त यह खनिज से भी युक्त होते है. इससे हड्डियों को ताकत मिलती है. इन चावलों में ग्लूटेन नहीं होता है, कम कैलौरी युक्त होते हैं साथ ही इनमें शर्करा की मात्रा भी कम होती है ऐसे में जो लोग अपनी डाइट और वजन घटाने को लेकर परेशान रहते हैं उनके लिए भी ये बहुत अच्छा आहार होता है. समा के चावलों का प्रयोग मधुमेह से प्रभावित व्यक्तियों के लिए भी बहुत लाभदायक होता है क्योंकि इसमें शुगर की मात्रा कम होती है.पोषण से भरपूर यह चावल व्रत के दौरान व्यक्ति को ताकत और स्फूर्ति दोनों प्रदान करने में सहायक होता है. साथ ही यह हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाता है.
आध्यात्मिक और आर्युवेदिक दृ्ष्टिकोण से समा के चावल पाचन में बहुत सहज और सौम्य कहे गए है. इस कारण धार्मिक रूप से भी इन चावलों का उपयोग व्रत एवं उपवास के दौरान करना उत्तम माना गया है. क्योंकि इस समय भोजन न कर पाने से हमारा पाचन तंत्र कमजोर होता है, ऐसे में यह चावल बहुत ही आसानी से पाचन क्रिया में सहायक बनते हैं और अच्छे फाइबर से युक्त होते हैं.
भगर या वरी की खेती, चावल की तरह ही की जाती है. यह घास के बीज से बनता है और इसे बर्नयार्ड मिलेट भी कहा जाता है. भगर की खेती, नम या जलभराव वाली मिट्टी में होती है.इसे कम बारिश वाले क्षेत्रों में मुख्य रूप से उगाया जाता है । भारत के कई हिस्सों में भगर का उत्पादन किया जाता है । इसकी फसल को शुगर फ्री चावल के तौर पर पहचानते है। भगर की खेती कम मेहनत वाली खेती है, जिसकी बुवाई बारिश के मौसम के बाद की जाती है । इसका उपयोग उबालकर चावल की तरह खाने में किया जाता है। प्रयोग करने से पूर्व इसके दाने के ऊपर उपस्थित छिलके को कूटकर हटाना आवश्यक रहता है ।
भगर की खेती कैसे होती है?
- भगर की खेती के लिए, स्थानीय प्रजातियों का इस्तेमाल किया जाता है.
- भगर की खेती में खते या कीटकनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया जाता.
- भगर की खेती में, बुवाई के 20-30 दिनों के अंदर एक बार हाथ से निंदाई करनी चाहिए.
- जहां पौधे न उगे हों, वहां पर ज़्यादा घने उगे पौधों को उखाड़कर रोपाई करनी चाहिए.
- भगर की खेती में, खरपतवारों को सही समय पर नियंत्रित करना चाहिए.
- भगर की खेती में, बुवाई से पहले 1 से 2 निराई करके खरपतवार हटाने चाहिए या शाकनाशी का छिड़काव करना चाहिए.
उन्नत जातियाँ
कोदों उन्नत किस्मे जवाहर भगर 13, जवाहर भगर 137, जवाहर भगर 155, आर. के. 390-25, इनके अतिरिक्त किस्मे निम्नलिखित तालुका में दी गई है |
उन्नत जातियॉं भगर | अवधि (दिनों में) | विशेषतायें | औसत उपज (क्विंटल/हेक्ट) |
भगर की उन्नत किस्मे | |||
जवाहर भगर 48 (डिण्डौरी-48) | 95-100 | इसके पौधों की ऊंचाई 55-60 सें.मी. होती है। | 23-24 |
जवाहर भगर – 439 | 100-105 | इसके पौधों की ऊंचाई 55-60 सें.मी. होती है। यह जाति विशेषकर पहाडी क्षेत्रों के लिये उपयुक्त है। इस जाति में सूखा सहन करने की क्षमता ज्यादा होती है। | 20-22 |
जवाहर भगर – 41 | 105-108 | इसके दानों का रंग हल्का भूरा होता है। पौधों की ऊंचाई 60-65 सें.मी. होती है। | 20-20 |
जवाहर भगर – 62 | 50-55 | इसके पौधों की ऊंचाई 90-95 सें.मी. होती है। यह किस्म पत्ती के धारीदार रोग के लिये प्रतिरोधी है यह किस्म सामान्य वर्षा वाली तथा कम उपजाऊ भूमि में आसानी से ली जा सकती है। | 20-22 |
जवाहर भगर – 76 | 85-87 | यह किस्मत ने की मक्खी के प्रकोप से मुक्त है। | 16-18 |
जी.पी.यू.के. – 3 | 100-105 | पौधों की ऊंचाई 55-60 सें.मी. होती है। इसका दाना गहरे भूरे रंग का बडा होता है। यह जाति संपूर्ण भारत के लिये अनुशंषित की गई है। | 22-25 |
भगर की उन्नत किस्मे | |||
जवाहर भगर 4 | 75-80 | सोल फसल साथ ही इंटर/मिश्रित फसल के रूप में उपयुक्त, एनपीके के लिए उत्तरदायी, सूखा प्रतिरोधी, और मुख्य कीट शूट फ्लाई और मध्यम रूप से हैड स्मट के लिए प्रतिरोधी | 13-15 |
जवाहर भगर – 1 (डिण्डौरी – 1) | 75-80 | इसका बीज हल्का काला व बाली की लंबाई 22 सें.मी. होती है। | 8-10 |
जवाहर भगर – 2 (डिण्डौरी – 2) | 75-80 | इसका बीज हल्का भूरा व अण्डाकार होता है। | 8-10 |
जवाहर भगर – 8 | 80-82 | इसका दाना हल्के भूरे रंग का होता है। पौधों की लंबाई 80 सें.मी. होती है तथा प्रति पौधा 8-9 कल्ले निकलते हैं | 8-10 |
सी.ओ. – 2 | 80-85 | इसके पौधा की लंबाई 110-120 सें.मी. होती है। यह संपूर्ण भारत के लिये अनुशंसित है। | 9-10 |
पी.आर.सी. – 3 | 75-80 | इसका पौधा की लंबाई 100-110 सें.मी. होती है। | 22-24 |
भगर के फ़ायदे-
- भगर में प्रोटीन, फ़ाइबर, कोलिन, आयरन, मैग्नीशियम, और फ़ॉस्फ़ोरस जैसे पोषक तत्व होते हैं.
- भगर में ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिससे यह रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद करता है.
- भगर से बने भोजन से पाचन बेहतर होता है.