
होलाष्टक में क्या नहीं करना चाहिए ?
- मान्यता है की होलाष्टक के दौरान भूलकर भी सगाई, नामकरण, विवाह, मुंडन आदि 16 संस्कार नहीं करने चाहिए क्योंकि इस दौरान किसी भी प्रकार के शुभ कार्यों की मनाही होती है।
- इन 8 दिनों की अवधि में नया वाहन, प्रॉपर्टी, मकान आदि खरीदने से भी बचना चाहिए। होलाष्टक के दौरान इस कार्यों को करना शुभ नहीं माना जाता है।
- होलाष्टक के दौरान ग्रह उग्र रहते हैं। ऐसे में इस दौरान नया बिजनेस भी शुरू नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से ग्रहों की उग्रता का प्रभाव आपके काम पर पड़ सकता है।
- अगर गृह निर्माण करवाने का विचार बना रहे हैं। तो होलिका दहन तक ऐसा बिल्कुल न करें। मान्यता है की होलाष्टक के दौरान नए मकान का निर्माण और गृह प्रवेश नहीं करना चाहिए।
- ज्योतिष मान्यता है की होलाष्टक के दौरान नौकरी बदलने से भी बचना चाहिए। कहीं नई जगह होलाष्टक से पहले या बाद में जाना चाहिए। लेकिन अगर नौकरी बदलना आवश्यक हो तो अपनी कुंडली किसी कुशल ज्योतिषी को दिखाकर सलाह लेनी चाहिए।
- होलाष्टक के दौरान हवन और यज्ञ जैसे कार्य करना या करवाना भी वर्जित माना गया है। ऐसा करने से प्रतिकूल प्रभावों का सामना करना पड़ सकता है।
होलाष्टक में क्या करना चाहिए?
- इन 8 दिनों के दौरान जप, तप और ध्यान करना बेहद अच्छा माना जाता है। इससे जातक के जीवन में सकारात्मक बदलाव आ सकते हैं। ऐसे में होलाष्टक में भगवान की विधिपूर्वक पूजा और ध्यान करना चाहिए।
- मान्यता है की इन दिनों भक्त प्रहलाद में विष्णुजी के लिए अटूट भक्ति थी। ऐसे में आप होलाष्टक के दौरान भगवान विष्णु की पूजा करने के साथ-साथ उनके मंत्र ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप कर सकते हैं।
- होलाष्टक के दौरान शिवजी की आराधना करने का भी खास महत्व है। इससे भक्तों पर भोलेनाथ की कृपा बनी रह सकती है। आप ‘ओम नमः शिवाय’ मंत्र का जाप कर सकते हैं।
- इन 8 दिनों में उग्र ग्रहों की शांति के लिए ज्योतिषी की सलाह लेकर उपाय कर सकते हैं। इससे जीवन से नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मकता बढ़ने लगती है।
होलाष्टक को क्यों मानते हैं अशुभ
इसके पीछे एक कथा छिपी हुई है। ऐसी मान्यता है की प्राचीन काल में भगवान शिव ने क्रोधवश कामदेव को भस्म कर दिया था। इसके चलते पूरी सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया। माना जाता है की इन 8 दिनों तक सभी ग्रह उग्र स्थिति में आ गए थे। तभी से होलाष्टक की परंपरा शुरू हुई। इस दौरान शुभ और मांगलिक कार्य करने से उग्र ग्रहों को प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
होलाष्टक का संबंध भक्त प्रह्लाद की अग्नि परीक्षा से है। कथा के अनुसार, हिरण्यकश्यप ने इन्हीं आठ दिनों में प्रह्लाद को अमानवीय यातनाएं दी थीं। अंत में पूर्णिमा के दिन होलिका दहन हुआ और बुराई पर अच्छाई की जीत हुई। इसीलिए इन आठ दिनों को नकारात्मक ऊर्जा वाला माना जाता है।
थम जाएंगी शहनाइयां, भक्ति में रमेगा शहर
ज्योतिषियों और धर्मशाखियों के अनुसार, फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक का यह समय साधना के लिए श्रेष्ठ है, लेकिन सांसारिक शुभ कार्यों के लिए वर्जित है। शहर के प्रसिद्ध मंगल कार्यालयों में अगले आठ दिनों तक सन्नाटा पसरा रहेगा।अब मांगलिक आयोजनों की रौनक होली के बाद ही लौटेगी। लोग अभी से होलिका दहन और धुलेंडी की खरीदारी में जुट गए हैं। 3 मार्च को होलिका दहन के बाद 4 मार्च की पूरे शहर में धूमधाम से धूलिवंदन मनाया जाएगा।
3 मार्च को होलिका दहन, 4 को धूलिवंदन
परंपरा में होलाष्टक का बड़ा महत्व है। इन दिनों में सगाई, नया व्यापार या संपत्ति की खरीदारी से बचना चाहिए। यह समय मंत्र जप, दान-पुण्य और आत्म-वितन के लिए सर्वोत्तम है।



